मूंगफली का टिक्का रोग पर टिप्पणी (Comments on Tikka Disease of Groundnut in hindi)

मूंगफली का टिक्का रोग (Tikka Disease of Groundnut)

मूंगफली का टिक्का रोग विश्व के उन सभी देशों एवं क्षेत्रों में होता है, जहाँ पर मूँगफली की खेती की जाती है। इस रोग के कारण प्रतिवर्ष फसल को 20 से 50% तक क्षति पहुँचती है।

मूंगफली का टिक्का रोग के लक्षण (Symptoms of disease of Tikka Disease of Groundnut)

1. रोग के लक्षण पत्तियों पर ही धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। इन धब्बों की संख्या काफी अधिक होती है। परिपक्व धब्बे गहरे भूरे से काले रंग के होते हैं। ये धब्बे टिकली (बिन्दी) के समान दिखाई देते हैं।

2. अत्यधिक संख्या में धब्बों के बनने के कारण पत्तियाँ धीरे-धीरे कमजोर होती जाती हैं और अन्त में गिर जाती हैं।

3. रोग के विस्तार होने पर फल आकार में छोटे एवं संख्या में कम बनते हैं।

मूंगफली का टिक्का रोग का रोगजनक (Causal organism of Tikka Disease of Groundnut)

यह रोग सोस्पोरा पसनेटम (Cercospora personathum) के संक्रमण के कारण होता है।

मूंगफली का टिक्का रोग का इटियोलॉजी (Etiology of Tikka Disease of Groundnut)

सकोस्पोरा का कषक जाल (Mycelium) अन्तरकोशिकीय (Intercellular) एवं अन्तराकोशिकीय (Intracellular) होते हैं। कवक तन्तु शाखित (Branched), रंगहीन (Colourless) तथा पट्टयुक्त (Sep tate) होते हैं। अन्तरकोशिकीय कवक तन्तु पोषक कोशिकाओं (Host cells) के अन्दर चूपकांग (Haustoria) उत्पन्न करते हैं जो पोषक से भोज्य पदार्थ के अवशोषण का कार्य करते हैं।

परिपक्व कवकजाल से बाद में एसरवुलस (Acerulus) बनता है जिसमें बहुत से कोनीडिया, कोनीडियोफोर्स के ऊपर लगे होते हैं। कोनीडियोफोर्स में गाँठे पाई जाती हैं। कोनीडियोफोर्स एवं कोनीडिया पट्टयुक्त होते हैं। प्रत्येक कोमीडिया में 4 या 5 पट्ट होते हैं तथा वह आधार पर गोल एवं शीर्ष पर नुकीला होता है। कोनीडियोफोर पोषक पत्ती की बाह्यत्वचा को तोड़कर एक गुच्छे में बाहर निकलकर एसरवुलस बनाते हैं। इन कोनीडियोफोर के ऊपर कोमीडिया बनते हैं। प्रत्येक कोनीडिया की लम्बाई 30-50 तथा चौड़ाई 5-6 तक होती है।

मूंगफली का टिक्का रोग का रोग चक्र (Disease cycle of Tikka Disease of Groundnut)

पौधों में प्राथमिक संक्रमण मृदा एवं बीजों की सतह पर उपस्थित कोनीडिया द्वारा होता है। संक्रमण हेतु 26°C से 31°C तापमान एवं उच्च पर्यावरणीय नमी की आवश्यकता होती है। पोषक पौधों के ऊतकों में प्राथमिक संक्रमण कोनीडिया के अंकुरण से बनी अंकुरण नाल (Germ tube) के द्वारा बाह्यत्वचा तथा रन्ध्रों के द्वारा होता है। संक्रमण प्रायः ऊपर बाह्यत्वचा से होता है। एक बार संक्रमण होने के पश्चात् द्वितीयक संक्रमण संक्रमित पत्तियों पर बने कोनीडिया के द्वारा होता है। इन कोनीडिया का वितरण प्राय: वायु द्वारा होता है। अनुकूल परिस्थितियों में ये कोनीडिया अंकुरित होकर संक्रमण करके रोग उत्पन्न करते हैं।