गेहूँ का किट्ट रोग पर टिप्पणी (Comments of Rust Disease of Wheat in hindi)

गेहूँ का किट्ट रोग (Rust Disease of Wheat)

गेहूँ के पौधों में रस्ट रोग का अध्ययन सर्वप्रथम डॉ. के.सी. मेहता के द्वारा किया गया था। इस रोग के कारण गेहूं की फसल को बहुत अधिक क्षति पहुंचती है तथा प्रतिवर्ष उत्पादन प्रभावित होता है। इसे रस्ट रोग, किट्ट रोग या रतुआ रोग के नाम से जाना जाता है।

गेहूँ के पौधों पर तीन प्रकार के किट्ट (Rust) रोग होते हैं -

1. स्तम्भ या काला रस्ट रोग (Stem or Black rust disease) – यह पक्सीनिया प्रेमिनिस ट्रिटिसाई (Puccinia graminis tritici) द्वारा होता है।

2. स्ट्राइप या पीला रस्ट रोग (Stripe or Yellow rust disease) - यह प. ग्रे. स्ट्राईफोर्मिस (P.g striformis) द्वारा होता है।

3. भूरा या नारंगी रस्ट रोग (Brown or Orange rust disease) - यह प. ग्रे. रिकॉन्डिटय (P.g. recondita) द्वारा होता है।


1. स्तम्भ या काला रस्ट रोग (Stem or Black Rust Disease)

1. इस रोग का लक्षण फरवरी के द्वितीय अथवा तृतीय सप्ताह में तनों पर लाल-भूरे फफोलों के रूप में दिखाई देते हैं। ये फफोले यूरिडोसोरस या टेल्यूटोसोरस के होते हैं।

2. जिस सोरस में यूरिडोस्पोर्स का निर्माण होता है उनमें ही या अलग से टेल्यूटोसोरस का निर्माण होता है। इस टेल्यूटोसोरस में बनने वाले टेल्यूटोस्पोर्स काले रंग के होते हैं। अत: बाद में पत्तियों एवं तनों के ऊपर काले रंग के फफोले उत्पन्न हो जाते हैं। इसी कारण इसे काला किट्ट रोग कहते हैं। इस रोग के लक्षण मार्च में दिखाई देते हैं।

स्तम्भ या काला रस्ट रोग का रोगकारक (Causal organism of Stem or Black Rust Disease)

गेहूँ का काला किट्ट रोग (Black rust) पक्सीनिया प्रेमिनिस वैरा ट्रिटिसाई (Puccinia graminis tritici) नामक कवक के द्वारा होता है।

2. स्ट्राइप या पीला रस्ट रोग (Stripe or Yellow Rust Disease)

स्ट्राइप या पीला रस्ट रोग के लक्षण (Symptoms of disease of Stripe or Yellow Rust Disease)
इस रोग में यूरीडियोसोरस का निर्माण मुख्यत: पर्णआच्छद (Leaf sheath), पत्तियों एवं ग्लूम्स में होता है। इस रोग के कारण सर्वप्रथम पत्तियों का हरा रंग समाप्त हो जाता है। पत्तियों पर पीले रंग की अण्डाकार या धारीनुमा पिटिकाएं (Pustules) उत्पन्न होती हैं। इन धारियों पर यूरिडोसोरस का निर्माण होता है। पोषक की बाह्य त्वचा फटने के बाद यह स्पोर्स बाहर आ जाता है।

स्ट्राइप या पीला रस्ट रोग का रोगकारक (Causal organism of Stripe or Yellow Rust Disease)

गेहूँ का स्ट्राइप या पीला रस्ट रोग "पक्सीनिया ग्रैमिनिस वैरा. स्ट्राइफोर्मिसनामक कवक के द्वारा होता है।

3. भूरा या नारंगी रस्ट रोग (Brown or Orange Rust Disease)

भूरा या नारंगी रस्ट रोग के लक्षण (Symptoms of disease of Brown or Orange Rust Disease) -  इस रोग में यूरिडोसोराई (Uredosori) का निर्माण केवल पत्तियों में होता है, इसमें यूरिडिया (Uredia) सम्पूर्ण पत्ती में बिखरे होते हैं। यूरिडिया आकार में अपेक्षाकृत बड़ा तथा पत्तियों की सतह पर चमकीले नारंगी धब्यों के रूप में होता है। इसमें टीलिया का निर्माण बहुत कम होता है।

भूरा या नारंगी रस्ट रोग का रोगकारक (Causal organism of Brown or Orange Rust Disease) - पक्सीनिया ग्रॅमिनिस वैरा, रिकॉण्डिटा.

भूरा या नारंगी रस्ट रोग का इटियोलॉजी (Etiology of Brown or Orange Rust Disease)

गेहूँ में रस्ट रोग होने पर इसमें दो प्रकार के स्पोर्स बनते हैं -

1. यूरिडोस्पोर्स (Uredospores),
2. टेल्यूटोस्पोर्स (Teleutospores) ।


यूरिडोस्पोर अण्डाकार एवं द्विनाभिकीय होता है तथा यह मोटी भित्ति द्वारा घिरा रहता है। इसकी बाह्य भित्ति एक्जाइन मोटी एवं कैंटीली तथा आन्तरिक भित्ति पतली होती है। टेल्यूटोस्पोर्स द्विकोशिकीय एवं लम्बवत् संरचना के रूप में होते हैं। इसकी प्रत्येक कोशिका में एक नाभिक तथा एक जननछिद्र होता है।

भूरा या नारंगी रस्ट रोग का रोग चक्र (Disease cycle of Brown or Orange Rust Disease)

भारतवर्ष में गेहूँ रबी फसल के रूप में बोई जाती है। गेहूं की फसल सामान्यत: नवम्बर-दिसम्बर में बोई जाती है। फरवरी के अन्तिम सप्ताह तक पौधों में रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। गेहूँ के पौधों में एक्सीनिया का संक्रमण दो स्रोतों से होता है। पहला संक्रमण स्रोत यूरिडोस्पोर्स (Uredospores) ही होते हैं। ये यूरिडोस्पोर्स संक्रमित पौधों या उसके भागों पक्सीनिया प्रेमिनिसके खरपतवारी पोषक घास थैलिक्ट्रम (Thallictrum) में उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार गेहूँ के पौधों में प्राथमिक संक्रमण मुख्यत: यूरिडोस्पोर्स के द्वारा होता है। चूँकि बारबेरी के पौधे पहाड़ी भागों में पाये जाते हैं तथा उन पर संक्रमण पूरे वर्ष बना रहता है तथा इसमें एसीडियोस्पोर्स बनते हैं। ये एसीडियोस्पोर्स भी हवा के माध्यम से पहाड़ों से मैदानी भागों में प्राथमिक संक्रमण का कार्य करते हैं। लगभग 6-7 घण्टों तक वातावरण एवं पत्तियों की सतह पर नमी की उपस्थिति में इन स्पोर्स (यूरिडोस्पोर्स एवं एसीडियोस्पोर्स) का अंकुरण होता है। ओस की बूँदें भी अंकुरण में सहायक होती हैं। एक बार संक्रमण होने के पश्चात् गेहूँ की पत्तियों में सर्वप्रथम यूरिडोसोराई में यूरिडोस्पोर्स बनते हैं। इन यूरिंडोस्पोर्स के बाद ही द्वितीयक संक्रमण (Secondary infection) होता है। वातावरण के तापमान में वृद्धि के साथ-साथ जिन यूरिडोसोराई में यूरिडोस्पोर्स बनते थे उनमें अब टिल्यूटोस्पोर्स (Teleutospores) बनने लगते हैं जो कि काले रंग के होते हैं। टिल्यूटोस्पोर्स के अंकुरण से मिट्टी में बेसीडियोस्पोर्स बनते हैं जो कि बारबेरी के पौधों पर संक्रमण करते हैं।

रस्ट रोग का नियंत्रण (Control of rust disease)

1. गेहूँ एवं जौ को एक साथ मिश्रित रूप से बोने से सुग्राही क्षेत्र (Susceptible area) कम हो जाता है तथा द्वितीयक संक्रमण की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।

2. खेतों में आस-पास उपस्थित कोलेटरल (Collateral) या एकान्तरित पोषकों (Alternate hosts) को नष्ट कर देना चाहिये, ताकि पक्सीनिया का जीवन-चक्र पूर्ण न हो पाये। इससे रोग की संभावनाएँ क्षीण हो जाती हैं।

3. गेहूँ की रोग प्रतिरोधी किस्मों जैसे – NP-4, NP-52, NP-125, BR-319, NI, 284S आदि को उगाना चाहिए।

4. खेत में प्रतिवर्ष फसल बदल-बदल कर बोना चाहिये।

5. रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए।

6. सल्फर डस्ट (Sulphur dust), नैबेम (Nabam), जिनैब (Zinab), मैनेब (Maneb) आदि का छिड़काव करना चाहिये।