सूक्ष्मजीव प्रौद्योगिकी पर टिप्पणी Comment on Microorganism Technology

मनुष्य द्वारा प्राचीनकाल से ही सूक्ष्मजीवों का उपयोग मानव कल्याण के लिए होता रहा है। दूध से दही का बनना, कार्बोहाइड्रेट स्रोत से फर्मन्टेशन द्वारा एल्कोहॉलिक पेय का उत्पादन, मक्खन, पनीर, चमड़ा शोधन आदि इसके उदाहरण हैं। जैसे-जैसे मानव सभ्यता का विकास हुआ, वैसे-वैसे सूक्ष्मजीवों के उपयोग का दायरा भी हमारे जीवन में बढ़ता गया। जैव-तकनीकी अथवा बायोटेक्नोलॉजी में सूक्ष्मजीवों के योगदान की समझने के पूर्व जैव-तकनीकी के बारे में जानकारी प्राप्त करना आवश्यक है।

परिभाषा (Definition)

जैव प्रौद्योगिकी या जैव-तकनीकी को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है, जिसमें से कुछ प्रमुख परिभाषाएँ निम्नलिखित हैं -

(1) सामान्य रूप से उपयोगी जैविक प्रक्रियाओं (Applied biological processes) के विज्ञान को जैव-प्रौद्योगिकी (Biotechnology) कहते हैं।

(2) यूरोपियन फेडरेशन ऑफ बायोटेक्नोलॉजी (European Federation of Biotechnology) ने इसे इस प्रकार परिभाषित किया है -


“आनुवंशिक प्रौद्योगिकी सूक्ष्मजीवों (Microorganisms), जन्तुओं (Animals) एवं पादप कोशिका संवर्धन (Plant cell culture) के गुणों (Properties) एवं क्षमताओं (Capacities) से लाभ प्राप्त करने के लिए ज्ञान (Knowledge) एवं तकनीकी (Technique) का समेकित उपयोग (Integrated application) है, जिसके द्वारा मानव जाति के लिए आवश्यक पदार्थों एवं यौगिकों के निर्माण के लिए भारी सम्भावनाएँ हैं।"

"जैव प्रौद्योगिकी (Biotechnology) के अन्तर्गत वे समस्त प्रौद्योगिक प्रक्रियाएँ आती हैं, जो कि जीवों की मध्यस्थता में सम्पादित होती हैं।"

जैव-तकनीकी का इतिहास (History of Biotechnology)

मनुष्य जैव प्रौद्योगिकी का उपयोग प्राचीनकाल से ही अप्रत्यक्ष रूप से करता आया है। उदाहरण-दही (Curd) एवं मदिरा (Wine) का निर्माण दही एवं मदिरा का निर्माण एक जैव प्रक्रिया है, जिसका ज्ञान एरिएस (Aryans) को 2500 BC. पूर्व से ही था। चूँकि उस समय वैज्ञानिक विधियों का विकास नहीं हुआ था, अतः जैव प्रौद्योगिकी का कोई आधार नहीं बन पाया। उन्नीसवीं शताब्दी में जैव प्रौद्योगिकी का विकास प्रारम्भ हुआ, जय लुईस पाश्चर (Louis Pasteur, 1860-1910) ने यीस्ट (Yeast) कोशिकाओं के द्वारा शर्करा का किण्वन करके एल्कोहॉल तैयार किया।

आनुवंशिक अभियांत्रिकी के क्षेत्र में वास्तविक अनुसंधान कार्य सन् 1960 में स्विट्जरलैण्ड के बेसिल विद्यालय के प्रोफेसर वर्नर-आर्बर (Werner-Arber) के द्वारा रिस्ट्रिक्शन एन्जाइम (Restriction enzyme की खोज के साथ प्रारम्भ हुई। यह एन्जाइम DNA को वांछित स्थान पर काटने के काम आता है। सन् 1970 में जीवाणुविक पुनर्संयोजन ( Bacterial recombination) तकनीक के क्षेत्र में नये आयाम जुड़े, जब वर्ग (Berg) ने SV-40 विषाणुओं के जीनों को जीवाणु के DNA में प्रत्यारोपित करने में सफलता प्राप्त की। इसी खोज के साथ जीन या DNA की संरचना में इच्छानुसार, वांछित परिवर्तन करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

सन् 1971 में डेनियल नाथन्स (Daniel Nathans) ने रिस्ट्रिक्शन एन्जाइम की सहायता से SV-40 विषाणु (बन्दर का ट्यूमर विषाणु) के DNA को खण्डित करने में सफलता प्राप्त की।

सन् 1971 में ही सर्वप्रथम पॉलबर्ग एवं साथियों (Paul Berg and Co- Workers) ने पुनर्योगज DNA अणु (Recombinant DNA molecule) के विकास में सफलता प्राप्त की।

प्लाज्मड एवं DNA लाइगेज (DNA-ligase) एन्जाइम की खोज के पश्चात बोयर (Boyer) एवं स्टेनले कोहन (Stanley Cohen) को ई. कोलाई ( E coli) में प्लाज्मिड का प्रत्यारोपण करने में सफलता प्राप्त हुई।

आनुवंशिक अभियांत्रिकी के उद्देश्य (Aims of Genetic Engineering)

आनुवंशिक अभियांत्रिकी के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं -

(1) जीव की विकृत न्यूक्लियोटाइड शृंखला (Disturbed nucleotide chain) को सामान्य न्यूक्लियोटाइड श्रृंखला के द्वारा प्रतिस्थापित करना।

(2) जीव के लक्षण प्रारूप (Phenotype) में इच्छानुसार परिवर्तन करना।

जैव प्रौद्योगिक एवं अनुवांशिकी अभियांत्रिकी के उपयोग (Uses of Biotechnology and Genetic Engineering)

(1) रासायनिक उद्योग के क्षेत्र में (In the field of chemical industry) - सुरुचिकारी (Flavouring) पदार्थों, प्लास्टिक एवं टेक्सटाइल उद्योग के उत्पादों का निर्माण आदि।

(2) औषधि उद्योग के क्षेत्र में (In the field of pharmaceutical industry) - इसके अन्तर्गत हॉर्मोन्स, वैक्सीन्स, प्रतिजैविक पदार्थों, विटामिन्स एव इन्टरफेरॉन आदि का निर्माण किया जाता है।

(3) ऊर्जा के क्षेत्र में (In the field of energy) - इसके अन्तर्गत ईंधन ऐल्कोहॉल (Fuel alcohol), बायोगैस, हाइड्रोजन का उत्पादन एवं अन्य स्रोतों से ऊर्जा का निर्माण सम्मिलित है।

(4) भोजन उद्योग के क्षेत्र में (In the field of food industry) - इसके अन्तर्गत यीस्ट (Backers yeast), शैवालों एवं जीवाणुओं से सिंगल सेल प्रोटीन (Single cell protein) का निर्माण किया जाता है, जिससे कुपोषण से बचा जा सकता है।

(5) कृषि के क्षेत्र में (In the field of agriculture) - इसके अन्तर्गत पादप ऊतक संवर्धन, प्रोटोप्लाज्म संवर्धन आदि क्रियाओं के द्वारा पौधों के क्लोन प्राप्त किया जाता है तथा उर्वरकों पर निर्भरता को कम तथा माइक्रोबियल कीटनाशकों का निर्माण किया जाता है, जर्मप्लाज्म का संग्रहण भी इसी श्रेणी के अन्तर्गत आता है।

(6) वातावरण के संरक्षण में (In the field of environmental protection) - इसके अन्तर्गत सीवेज उपचार, घरेलू वर्ज्य पदार्थों का रूपान्तरण, जैव-विघटनकारी (Biodegradable) यौगिकों का निर्माण किया जाता है।

(7) जैव धातु विज्ञान के क्षेत्र में (In the field of biometallurgy)-इसके अन्तर्गत सूक्ष्मजीवों की सहायता से धातुओं को प्राप्त किया जाता है।

आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा ही पुनर्योगज DNA तकनीक (आनुवंशिकी अभियांत्रिकी) की खोज हो पायी है। इस विधि के द्वारा फॉरन DNA को सूक्ष्मजीवों में प्रत्यारोपित किया जाता है।

(8) चिकित्सा के क्षेत्र में (In the field of medicine) - इसके द्वारा विभिन्न सूक्ष्मजीवों की सहायता से विभिन्न प्रकार के प्रतिजैविकों एवं दवाइयों का निर्माण किया जाता है, जो कि हमें बीमारियों से सुरक्षा प्रदान करते हैं।

(9) नाइट्रोजन स्थिरीकरण में (In the field of nitrogen fixation) - आनुवंशिक इन्जीनियरिंग खाद्य समस्या को सुलझाने में बहुत मददगार सिद्ध हो सकती है, जैसे अगर किसी भी तरह राइजोबियम (Rhizobium) तथा ऐजोटोबैक्टर (Azotobacter) नामक जीवाणु के नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने में सक्षम जीन्स फसलों में प्रविष्ट करा दिये जायें तो कृषि के क्षेत्र में क्रान्ति आने की सम्भावना हो जायेगी और खाद को सस्ते दामों पर उपलब्ध कराने की सरकार की समस्या का समाधान हो जायेगा। जैव-तकनीकी के कारण अनेकानेक उत्तम उन्नतशील किस्में फसलोत्पादन में अपनी भूमिका निभा रही है।