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मादा जनन तंत्र - Female reproductive system in Hindi

मनुष्य के मादा जनन तंत्र

मनुष्य का मादा जनन तंत्र कई अंगों का बना होता है, जिसमें अण्डाशय मुख्य जनन अंग तथा शेष अंग द्वितीयक जनन अंग कहलाते हैं। इसका वर्णन निम्नलिखित अनुसार है -

(1) अण्डाशय (Ovary) - स्त्री में एक जोड़ी बादाम के आकार के अण्डाशय उदरगुहा के निचले भाग में गर्भाशय के दोनों तरफ एक-एक की संख्या में स्थित होते हैं। प्रत्येक अण्डाशय उदरगुहा की पृष्ठ दीवार से मीजोवेरियम (Mesovarium) तथा गर्भाशय से चौड़ा स्नायु (Broad ligaments) नामक पेशी द्वारा जुड़ा होता है। इनसे होकर कई रुधिर वाहिकाएँ तथा लसीका वाहिकाएँ अण्डाशय में जाती हैं। प्रत्येक अण्डाशय लगभग 4 सेमी लम्बा, 2-5 सेमी. चौड़ा तथा 1.5 सेमी. मोटा होता है।

अण्डाशय की औतिकी (Histology of ovary)

अण्डाशय चारों तरफ से एक कोशिका स्तर मोटी जनन उपकला (Germinal epithelium) पायी जाती है, जिसकी कोशिकाएँ घनाकार (Cuboidal) होती हैं। इस स्तर के नीचे दो भागों में विभाजित संयोजी ऊतक पाया जाता है। बाहरी भाग को कॉर्टेक्स तथा भीतरी भाग को मेड्यूला (Medulla) कहते हैं, लेकिन इन दोनों भागों के बीच में कोई निश्चित विभाजक रेखा नहीं पायो जाती है। मेड्यूला के अन्दर रुधिर वाहिकाएँ बिखरी रहती हैं, जबकि कॉर्टेक्स में कई कोशिकाओं की बनी हजारों की संख्या में विशिष्ट रचनाएँ पायी जाती हैं, जिन्हें अण्डाशयी पुटिकाएँ (Ovarian follicle) कहते हैं। अण्डाशय के विकास के समय जनन उपकला कोशिकाएँ अन्दर को धँसकर ही पुटिका का निर्माण करती हैं। इस पुटिका की एक कोशिका प्राथमिक ऊसाइट कहलाती है और यही विकसित होकर अण्डाणु का निर्माण करती है। कसाइट के चारों तरफ की कोशिकाएँ पुटिका उपकला (Follicular epithelium) कोशिकाएँ कहलाती हैं और पुटिका की बाह्य स्तर बनाती हैं। एक लड़की के दोनों अण्डाशयों में जन्म के समय लगभग 2,50,000 से 4,00,000 तक पुटिकाएँ होती हैं, लेकिन एक स्त्री के सम्पूर्ण जीवन काल में लगभग 400 पुटिकाएँ ही परिपक्व हो पाती हैं शेष पुटिकाएँ वयस्क अवस्था के बाद निष्क्रिय हो जाती हैं। मनुष्य के अण्डाशय में ये पुटिकाएँ युवा स्त्री में 4 विकासात्मक अवस्थाओं में पायी जाती हैं, जिन्हें निम्नलिखित अलग-अलग नामों से जानते हैं -

(i) आदि पुटक (Premordial follicle) - पुटिकाएँ एक ऊसाइट और उसके घेरे हुए कुछ पुटिका कोशिकाओं की बनी होती हैं। ये प्राथमिक प्रकार की पुटिकाएँ हैं, जो स्त्रो शिशु की भ्रूणीय अवस्था के अण्डाशय में पायी जाती है, लेकिन इनमें से कुछ इनके जन्म के बाद भी दिखायी देती हैं। इसमें ऊसाइट पूर्णतः पुटक कोशिकाओं से घिरा नहीं होता।

(ii) प्राथमिक पुटक (Primary follicle) - आदि पुटक ही विकसित होकर प्राथमिक पुटक बनाता है। अर्थात् यह अण्ड निर्माण के दूसरे चरण को व्यक्त करती है। इस प्रकार के पुटक में ऊसाइट पुटिका कोशिकाओं के एक स्तर द्वारा घिरा रहता है।

(iii) बेसिकुलर पुटक (Vesicular follicle) - यह प्राथमिक पुटकों से विकसित होती है अर्थात् यह अण्डाणु निर्माण की तीसरी अवस्था को व्यक्त करती है। प्राथमिक पुटक कोशिकाएँ विभाजित होकर ऊसाइट के चारों तरफ कई कोशिका मोटी स्तर बनाकर बेसिकुलर पुटक का निर्माण करती हैं।

(iv) डिम्ब पुटक (Graafian follicle) - यह अण्ड निर्माण को अन्तिम अवस्था है। पुटक विकास की इस अवस्था में अण्डाणु पूरी तरह से विकसित हो जाता है और अण्डाशय से बाहर निकलने के लिए तैयार हो जाता है। इसके निर्माण के लिए वेसिकुलर पुटिका की पुटक कोशिकाएँ विभाजित होकर ऊसाइट के चारों तरफ कई स्तर बना देती है। यह पुटिका आकार में बड़ी हो जाती है और उसके बीच में पुटिका के बड़ा होने के कारण एक गुहा बन जाती है, जिसे ऐण्ट्रम (Antrum) कहते हैं। एण्ट्रम के चारों तरफ की पुटिका कोशिकाएँ दो स्तरें बना देती हैं, बाहर की तरफ जोना पेलुसिडा तथा भीतरी जोना ग्रेनुलोसा। जब पुटिका कोशिकाएँ पूर्णत: विकसित हो जाती हैं अर्थात् डिम्ब पुटक का निर्माण पूर्ण हो जाता है तब अण्डाशय की दीवार फट जाती है और अण्डाणु देहगुहा में आ जाता है। यह क्रिया अण्डोत्सर्ग (Ovulation) कहलाती है।

(2) अण्डवाहिनी या फेलोपियन नलिका (Oviduct or Fallopian tube) - प्रत्येक अण्डाशय के पास झालरदार कीप के समान मुख वाली एक-एक नलिका शुरू होती है, जिसमें से प्रत्येक की लम्बाई लगभग 10 सेमी होती है। इनके कीप के समान स्वतन्त्र सिरे को फिम्ब्री (Fimbriae) कहते हैं। इसकी दीवार पेशीय होती है और इसकी फिम्ब्री में अनेक सिलिया पाये जाते हैं, जिनकी गति के कारण अण्डाशय से निकला अण्डाणु फिम्ब्री में आ जाता है। अण्डवाहिनियों के दूसरे सिरे गर्भाशय से जुड़े होते हैं इस कारण यह अण्डाणु को उदरगुहा से ग्रहण करके गर्भाशय में पहुँचाती है। जब अण्डाणु अण्डाशय से देहगुहा में आता है, तो यह पूर्णतः परिपक्व में नहीं होता इसका शेष परिपक्वन अण्डवाहिनी में होता है। निषेचन की क्रिया भी अण्डवाहिनी में ही होती है।

(3) गर्भाशय (Uterus) - गर्भाशय नाशपाती के समान रचना है, जो लगभग 7.5 सेमी लम्बा, 5 सेमी चौड़ा तथा 3.5 सेमी मोटा होता है और उदर गुहा के निचले श्रोणि भाग (Pelvic region) में स्थित होता है। इसके आगे की तरफ मूत्राशय तथा पीछे की तरफ मलाशय स्थित होता है। इसका ऊपरी भाग चौड़ा तथा निचला भाग सँकरा होता है। इसकी दीवार मोटी तथा मांसपेशियों की बनी होती है। दीवार की बाहरी पेशी स्तर मायोमेट्रियम तथा भीतरी स्तर एण्डोमेट्रियम कहलाती है। गर्भाशय का निचला सँकरा तथा उभरा भाग ग्रीवा (Cervix) कहलाता है, जो योनि में खुलता है। गर्भाशय का मुख्य कार्य निषेचित अण्डाणु को भ्रूण बनने तथा उसके विकास के लिए स्थान प्रदान करना है। इस कार्य हेतु गर्भावस्था में इसकी गुहा फैलती है एवं इसकी दीवार पतली तथा दृढ़ हो जाती है।

(4) योनि तथा योनि अंग (Vagina and vaginal organs) - योनि तथा योनि अंगों को एक साथ भग (Valva) कहते हैं। योनि एक सँकरी नली है, जिसकी दीवार पेशी ऊतक की बनी होती है। इसका ऊपरी सिरा गर्भाशय की ग्रोवा से जुड़ा होता है, जबकि दूसरा सिरा मादा जनन छिद्र के रूप में बाहर यूरेथ्रा के छिद्र के पीछे खुलता है। इस छिद्र को योनिद्वार (Vaginal orifice) कहते हैं। योनि की दीवार में बल्बोरीथल ग्रन्थियाँ पायो जाती हैं जिनका स्राव मैथुन के समय योनि को चिकना बना देता है। भग के दोनों किनारों पर दोहरी त्वचा को बनी एक रचना होती है, जिसे लघु भगोष्ठ (Labia minora) कहते हैं, लघु भगोष्ठ के चारों तरफ एक मोटी मांसल रचना होती है, जिसे वृहद् भगोष्ठ (Labia majora) कहते हैं।